Monday, September 13, 2010

नक्सलवादियों से

   अब भी वक़्त है ..
   आ जाओ कि हम मोहब्बत से दस्तक देते हैं
   कुछ साँसे मोहब्बत की सौगात ले जाओ ,
   एक बड़ा समूह है जो
   तुम्हें, तुम्हारे हथियार के साए से बाहर बुलाता है
   कि आ जाओ
   हमारे उपर भी लगे ज़ख्म गहरे हैं ,
   अब भी उजड़े -उजड़े 

   इधर- उधर भागते बहुतों चेहरे हैं
   कि हर हाथ को काम नहीं .
   बेकाम थकते रहते हैं
   रात को भी आराम नहीं .
   सोचते हैं ,
   तुमने हथियार क्यों उठा
रक्खा है
   हमने तो बस एक सवाल बांध रक्खा है
   पूछेंगे आओ
   मिलकर,
   के भारत का ये हाल क्यों हुआ रक्खा है
   आस है, तुम्हारे लौट आने की
   बरगद की छाँव में , खाली पड़े गावं में
   बस तुम्हारा ही बुलावा लगा
रक्खा  है
   कि होश कहाँ है अब
   जब तलक तुम लौट न आवोगे .
 

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